Kanker: अंतागढ़ में आदिवासी अस्मिता और अधिकारों का महाकुंभ, 70–80 हजार की भीड़ ने भरी हुंकार

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Kanker: ढोल-मांदर की थाप, पारंपरिक वेशभूषा में सजे हजारों लोग और आदिवासी अधिकारों के नारों से रविवार को अंतागढ़ का उन्मुक्त खेल मैदान गूंज उठा. विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित जिला स्तरीय कार्यक्रम में ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि पूरा मैदान आदिवासी एकजुटता और अस्मिता के रंग में नजर आया.

अंतागढ़ में आदिवासी अस्मिता और अधिकारों का महाकुंभ

छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे आदिवासी समाज के लोगों ने अपनी संस्कृति, परंपरा और अधिकारों के प्रति एकजुटता का प्रदर्शन किया. आयोजकों के अनुसार करीब 70 से 80 हजार लोगों की मौजूदगी वाले इस आयोजन में जल-जंगल-जमीन से लेकर संविधान में मिले अधिकारों की रक्षा तक कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर जोरदार आवाज उठी.

यह आयोजन महज सांस्कृतिक उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आदिवासी समाज के अधिकार, पहचान, स्वशासन और प्राकृतिक संसाधनों पर हक से जुड़े सवालों का बड़ा मंच बन गया. मंच से 15 सूत्रीय मांगों को प्रमुखता से उठाते हुए ग्रामसभा की शक्ति, पेसा और वन अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन, आदिवासी भूमि की सुरक्षा, स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता, खनिज संपदा में स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी और आदिवासी संस्कृति एवं धार्मिक पहचान के संरक्षण की मांग की गई.

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मण यादव ने कहा कि आदिवासी समाज की लड़ाई विकास के खिलाफ नहीं, बल्कि ऐसे विकास के लिए है जिसमें उनके अधिकार और भागीदारी सुरक्षित रहे। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन से आदिवासी समाज का रिश्ता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, पहचान और जीवन-पद्धति से जुड़ा हुआ है. इसलिए विकास के नाम पर इन अधिकारों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए. डॉ. यादव ने कहा कि आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक वीरों ने अपना जीवन बलिदान किया है. वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह उनके संघर्ष और बलिदान को आगे बढ़ाए। उन्होंने कहा कि संविधान में आदिवासी समाज के संरक्षण के लिए किए गए प्रावधान तभी सार्थक होंगे, जब उनका प्रभाव कागजों से निकलकर जमीन पर दिखाई दे.

15 सूत्रीय मांगों को लेकर उठी बुलंद आवाज

विश्व आदिवासी दिवस के मंच से आदिवासी समाज की ओर से 15 सूत्रीय मांगों को प्रमुखता से उठाया गया। संयुक्त ज्ञापन में संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण एवं प्रभावी क्रियान्वयन की मांग की गई.

जनगणना में पृथक आदिवासी धर्म कोड की मांग

आदिवासी समाज की विशिष्ट धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए आगामी जनगणना में पृथक ‘आदिवासी धर्म कोड’ शामिल करने की मांग की गई. आदिवासी पारंपरिक आस्था और विश्वास को मान्यता देने तथा जनगणना में समुदाय की वास्तविक संख्या और सामाजिक स्थिति का सही आकलन सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया.

परिसीमन में राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुरक्षित रखने की मांग

परिसीमन के दौरान अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम नहीं करने तथा आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग की गई. आरक्षित सीटों की संख्या और प्रभावशीलता बनाए रखने पर भी जोर दिया गया.

स्थानीय युवाओं को भर्ती में प्राथमिकता

अनुसूचित क्षेत्रों में शासकीय एवं अर्धशासकीय सेवाओं में स्थानीय आदिवासी युवाओं को प्राथमिकता देने तथा इसके लिए आवश्यक नियम बनाने की मांग की गई. सीधी भर्ती एवं पदोन्नति में आरक्षण का प्रभावी लाभ दिलाने और आरक्षण व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन की मांग भी रखी गई.

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